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बाग़-ए-इश्क़ खिलता हैं... 
हुस्न जब मेहरबाँ होता हैं!


- मनोज 'मानस रूमानी'
दो बहनें हैं मराठी और हिंदी
एक माँ है और दूसरी मौसी!
तो उर्दू से हमें मोहब्बत हैं..
सलामत रहें ये सभी प्यारी!

- मनोज 'मानस रूमानी'
क्या सच होगा यह ख़्वाब कभी..
ख़त्म हो जुदाई, हटे सरहद भी!
एक जड़ के रहतें इस-उस तरफ
मिटाएं झगड़े और होंगे एक ही!

- मनोज 'मानस रूमानी'
मुश्किल ही है चाँद को मनाना
यहाँ अपना हो या आसमाँ का!

- मनोज 'मानस रूमानी'
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जंग की बातें ना हो..यहाँ-वहाँ
पैग़ाम-ए-प्यार फ़ैले..यहाँ-वहाँ
- मनोज 'मानस रूमानी'
एक ही वतन में सब साथ थे कभी..
बटवारे से झगड़तें छोड़ गएँ फ़िरंगी!

- मनोज 'मानस रूमानी'
बरक़रार रहे जन्नत-ए-कश्मीर 
हुस्न-ओ-इश्क़ का अपना चमन 

- मनोज 'मानस रूमानी'