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नव वर्ष..विचार!! चैत्रातील हा नव वर्षारंभ घेऊन येवो नव चैतन्य..! 'वसुधैव कुटुंबकम्' विचारानं सर्व मानवजातीच्या प्रगतीचं! धर्म-जात सर्व भेद विसरून.. प्रेम, स्नेह भाव रुजवण्याचं! - मानस रूमानी
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ताज्जुब की इसका इल्म भी नहीं उन्हें हम ताउम्र मन ही मन चाहते रहे जिन्हें - मानस रूमानी  
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उम्मीदों के फूल तो खिलते ही रहेंगे.. ख़िज़ाँ को फ़स्ल-ए-गुल में बदल देंगे! - मानस रूमानी
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फूल बनके खिलना चाहती है कलियाँ मुरझा न दो उन्हें, महकने दो आसमाँ! - मानस रूमानी (महिला दिन शुभकामनाएं!)
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नसीम-ए-सहर की लिए आरज़ू गुज़रती हैं वहां पर शब मायूस! - मानस रूमानी
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कोई अपने तकब्बुर में, तो कोई ताबेदारी में चुप्पी साधे हुए सब ताकतवरों के तशद्दुद में - मानस रूमानी
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ये दुनिया किसी की जागीर नहीं ये किसी के इशारे पे नहीं चलेगी - मानस रूमानी