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रईसों का 'कमल' मुरझाने लगा.. 
मुफ़लिसों को 'हाथ' मिलने लगा! 

- मनोज 'मानस रूमानी'
क़ौमी एकता हैं इस मुल्क़ की शान..
कोई न करे किसीकी बेवतन की बात!

- मनोज 'मानस रूमानी'
इनायत उस बहार-ए-हुस्न की हैं..🌷
जो हम से रूमानी शायरी होती हैं!✍️


- मनोज 'मानस रूमानी'
प्यार झलकती उनकी आँखें ख़ूबसूरत
भुला देती हैं यह दुनियाँ संगदिल!


- मनोज 'मानस रूमानी'
मुस्तक़बिल उनसे हैं हमारा..
मुंतज़िर हूँ जिनके दीदार का!


- मनोज 'मानस रूमानी'
तसव्वुर-ए-हुस्नपरी उनके आगे नहीं
किसी और की चाहत..मुमकिन नहीं!

- मनोज 'मानस रूमानी'
खुली राह मिला दे मुल्कों को
जो दरअसल कभी एक ही थे!

- मनोज 'मानस रूमानी'