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ये कैसी हमारी वफ़ा-ए-मोहब्बत है न इज़हार किए इश्क़ में ताउम्र है! - मानस रूमानी
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प्यार जगाके, न रुकके हो जाते रुख़्सत कहीं फ़ितरत या होशियारी होती ये हुस्नवालों की! - मानस रूमानी
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पत्थर के सनम बन गए है अब वे जो हमारे हमनफ़स हुआ करते थे - मानस रूमानी
ख़ुद-कफ़ील हो अवाम जिस सरज़मीन मिटा नहीं सकता कोई ऐसी सरज़मीन! - मानस रूमानी
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उल्फ़त में होती है नफ़ीस रूमानी शायरी. फ़ुर्क़त में बयाँ होती है उसके बिना ज़िंदगी - मानस रूमानी
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स्नेह और प्यार उतरता रहें कलम से. शायरी गुलों की तरह खिले दिलों में! - मानस रूमानी ('राष्ट्रीय काव्य माह' की शुभकामनाएं!) (Happy National Poetry Month!)
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जोर-ए-हवा से बेमौसम बारिश आई यादों के हसीन पन्ने यूँ उड़ा के गई! - मानस रूमानी