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You feel the world is beautiful when you have love with you! - Manoj 'manas roomani' [I wrote these lines, when saw this image of Gregory Peck with Ingrid Bergman from Hitchcock's film 'Spellbound' (1945). It's tribute to her on 105th birth anniversary!]
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दो जुगों के चहेते नायकों का ये जश्न.. छलकते जाम, बदले बदले से हमसफ़र चंदेरी दुनियाँ ने फिर यूँ बदली करवट.. रात में ही उसका ताज आया इसके सर - मनोज 'मानस रूमानी'  
कैसे हो सकता हैं इश्क़-ए-पाक़ वो जिसकी बुनियाद ग़र तिज़ारत हो - मनोज 'मानस रूमानी'
वीरान ज़िंदगी तब शादाब होती हैं इश्क़ की इबादत जब रंग लाती हैं - मनोज 'मानस रूमानी'
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मोहब्बत के नाम पर सरल ग़ज़ल लिख़ने की मेरी यह क़ोशिश हैं.. इंतज़ार-ए-इश्क़! ऐ मोहब्बत तू मिलेंगी फिर ये हमें हैं यक़ीन ज़िंदगी हमारी होंगी हसीन ये हमें हैं यक़ीन यूँ तो दीदार-ए-हुस्न हर मोड़ पर हुआ हमें अब एहसास-ए-इश्क़ होगा ये हमें हैं यक़ीन छूट गया था हमसे हसीन लम्हा ज़िंदगी में इज़हार-ए-इश्क़ का पा लेंगे ये हमें हैं यक़ीन वाक़िफ़ हैं हुस्न-ओ-इश्क़ से ख़ूब हम 'मानस' जीत ही लेंगे प्यार की मंज़िल ये हमें हैं यक़ीन - मनोज 'मानस रूमानी'
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मेरे सबसे अज़ीज़ गायक मोहम्मद रफ़ी जी से सपने में हुई मुलाक़ात पर मैंने यह लिखा.. हसरत हुई पूरी! एक ख़लिश मन में थी.. काश मिलते अज़ीज रफ़ी जल्द रुख़सत हुए थे वे हम मिलने से पहले ही हसरत उन्होंने पूरी की हमारी उनसे मिलने की कल सपने में आए घर.. बैठाया उन्हें जगह ऊँची बातें कर ली खूब सारी उनकी आवाज़-गाने की निकल चुके थे वे तब.. जब मेरी आँखें खुली.. कानों में आवाज़ गूँजी.. "तेरी दुनिया से दूर s चले हो के मजबूर.." मेरी आँखें नम हुई! - मनोज 'मानस रूमानी'
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गणेशोत्सव आणि प्राजक्ताची फुले यांचे सुगंधी नाते माझ्या बालपणाशी जोडले होते! ते मी या कवितेत उतरवले आहे.. तो प्राजक्त सुगंधी! आठवणींच्या हिंदोळ्यावर आज प्राजक्त फुलला गेणेशोत्सवातले रम्य बाल्य पुन्हा घेऊन आला श्रावण सर येऊन जाता दरवळे गंध मातीचा.. भाद्रपदाची चाहुल मग देई सुगंध प्राजक्ताचा हळुवार भावनांना फुलवणारा साथी तो होता टप टप टप पडणारा सडा असा प्राजक्ताचा ऋतु असेच फुलत होते काळ पुढे जाता... ऋणानुबंध ही होत होता वृद्धिंगत आमचा फुल त्याचे ऐटीत कळीवर होते एकदा.. बहुदा सुचवत होते क्षण आला प्रीतीचा मीही मग पाहिली जुई फुललेली बाजुला.. घेतली फुले तिची देण्या पहिल्या प्रेमाला! - मनोज 'मानस रुमानी'