मुख़्तलिफ़ बादलों से गुजरते..
जैसे दीदार-ए-चाँद होता रहता!
आजकल कई चिलमनों से आते..
वह रुख़-ए-महताब भी हैं दिखता!
- मनोज 'मानस रूमानी'
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हो मयस्सर सफ़र! जी तो करता हैं खूब घूमें दुनिया का हसीं नज़ारा देखें अब बहलाते हैं सफरनामें रह गया है कुछ तसव्वुर में हो मयस्सर जहाँ जी चाहें घूमें कश्मीर की हसीं वादियां देखें लखनऊ की नजाकत, नफासत शायराना माहौल भी आजमायें रूमानी पेरिस का सफर करें रंगीन शाम का लुत्फ़ उठाये अपने ताज़ का फ़िर दीदार करे चाँद देखके इज़हार-ए-इश्क़ करे - मनोज 'मानस रूमानी' ('विश्व पर्यटन दिन' पर लिखा!)

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